फर्जी SC/ST एक्ट , मां बाप और भाइयों की मौत : 20 साल जेल में रहने के बाद बरी हुए विष्णु तिवारी की पूरी कहानी,23 साल की उम्र में गए थे जेल

विष्णु तिवारी की दर्दनाक कहानी: 20 साल जेल में रहने के बाद हाईकोर्ट से बरी हुए। जानिए SC/ST एक्ट केस, ट्रायल कोर्ट सजा, 16 साल लंबित अपील और पूरी घटना का सच।

Sep 21, 2026 - 12:34
Sep 21, 2026 - 12:35
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फर्जी SC/ST एक्ट , मां बाप और भाइयों की मौत : 20 साल जेल में रहने के बाद बरी हुए विष्णु तिवारी की पूरी कहानी,23 साल की उम्र में गए थे जेल
विष्णु तिवारी की कहानी: 20 साल जेल में रहने के बाद हाईकोर्ट से बरी

फर्जी SC/ ST एक्ट, मां बाप और भाइयों की मौत : 20 साल जेल में रहने के बाद बरी हुए विष्णु तिवारी की पूरी कहानी,23 साल की उम्र में गए थे जेल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के रहने वाले विष्णु तिवारी की कहानी भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की धीमी गति और न्याय में देरी की एक गंभीर मिसाल के रूप में सामने आती है। मात्र 23 वर्ष की उम्र में साल 2000 में उन्हें एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया और मार्च 2021 में जब वे आगरा सेंट्रल जेल से रिहा हुए, तब उनकी उम्र 43 वर्ष हो चुकी थी। इन 20 वर्षों में उनका पूरा जीवन बदल गया—परिवार बिखर गया, जमीन बिक गई और जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय जेल में गुजर गया।

क्या था पूरा मामला:

मीडिया रिपोर्ट की माने तो अभियोजन पक्ष के अनुसार 16 सितंबर 2000 को एक महिला खेत की ओर जा रही थी। आरोप लगाया गया कि विष्णु तिवारी ने उसे पकड़कर बलात्कार किया, जातिसूचक शब्द कहे और धमकी दी। घटना के तीन दिन बाद 19 सितंबर को शिकायत दर्ज हुई, जिसके बाद विष्णु तिवारी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (बलात्कार) और 506 (धमकी) के साथ-साथ SC/ST Act की धाराएं 3(1)(xii) और 3(2)(v) लगाई गईं। मामले को गंभीर बनाते हुए पीड़िता के अनुसूचित जाति से होने का पहलू भी जोड़ा गया। हालांकि, विष्णु तिवारी ने शुरू से ही खुद को निर्दोष बताया और आरोपों से इनकार किया। बचाव पक्ष ने भूमि विवाद को इस केस की जड़ बताया, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई।

ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद की सुनाई सजा

24 फरवरी 2003 को ललितपुर की सत्र अदालत ने विष्णु तिवारी को दोषी ठहराते हुए: IPC धारा 376 के तहत 10 साल की सजा SC/ST Act के तहत उम्रकैद,सभी सजाएं साथ-साथ चलाने का आदेश दिया गया। इस फैसले के बाद विष्णु तिवारी का जीवन पूरी तरह बदल गया और उन्हें आगरा सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

जेल के अंदर की जिंदगी:

जेल में शुरुआती दिन उनके लिए बेहद कठिन रहे। उन्होंने कई दिनों तक खाना नहीं खाया, लेकिन बाद में मजबूरी में जेल जीवन के अनुसार खुद को ढालना पड़ा। उन्होंने बताया कि जेल में कई बार मारपीट हुई, यहां तक कि उनके पैरों की हड्डियां भी टूट हुईं हैं जिसके कारण वे आज भी लंगड़ाकर चलते हैं। कम पढ़े-लिखे होने के कारण उन्हें जेल में खाना बनाने का काम दिया गया, जहां वे रोज हजारों रोटियां बनाते थे।

बिखर गया पूरा परिवार

जेल में रहते हुए विष्णु तिवारी को अपने परिवार के टूटने की खबरें मिलती रहीं: पिता की मौत (2013),भाई की मौत (2014),मां की मौत (2015),एक और भाई की मौत (2017) हो गई ,वे इनमें से किसी का अंतिम संस्कार भी नहीं देख पाए। परिवार की जमीन भी केस लड़ते-लड़ते बिक गई और घर खंडहर बन गया।

 16 साल तक अटकी रही फाइल

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की गई, लेकिन यह अपील “डिफेक्टिव” बताकर करीब 16 वर्षों तक लंबित रही। इस दौरान विष्णु तिवारी जेल में ही रहे, बिना इस बात के कि उनकी अपील पर सुनवाई कब होगी।

2021 में हाईकोर्ट का फैसला

जब अंततः हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत ने मामले के तथ्यों पर विस्तार से विचार किया। फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं: FIR में 3 दिन की देरी,गवाहों के बयान में विरोधाभास,मेडिकल रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि नहीं,कोई ठोस सबूत नहीं इन आधारों पर अदालत ने विष्णु तिवारी को दोषमुक्त करते हुए रिहा करने का आदेश दिया।

आजादी भी बोझ बन गई

2 मार्च 2021 को उन्हें जेल में रिहाई की सूचना मिली और 3 मार्च को उन्हें रिहा कर दिया गया।जेल से निकलते समय उन्हें मात्र 500 रुपये दिए गए। लेकिन बाहर आने के बाद उनकी स्थिति और भी कठिन हो गई: पूरा परिवार खत्म हो चुका था,घर खंडहर में बदल चुका था, समाज में कोई स्वीकार्य ही नहीं कर रहा था।

गांव वाले पहचान भी नहीं पाए 

रिहाई के बाद जब वे अपने गांव लौटे तो लोग उन्हें पहचान नहीं पा रहे थे।,उनका घर टूट चुका था और परिवार का कोई सदस्य जीवित नहीं था।,यह उनके जीवन का सबसे भावनात्मक और दर्दनाक पल था।जमीन भी बिक चुकी थी रहने के लिए घर नहीं था।

 संघर्ष और मानसिक पीड़ा

रिहाई के बाद भी विष्णु तिवारी का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। आज वे लखनऊ में एक घर में खाना बनाकर जीवनयापन कर रहे हैं। समाज में उन्हें काम मिलने में भी कठिनाई होती है क्योंकि लोग उनके जेल के अतीत को देखकर दूरी बना लेते हैं। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि: उन्हें रातों को नींद नहीं आती,मानसिक तनाव लगातार बना रहता है,कई बार जीवन से निराशा महसूस होती है.

यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है:न्याय में इतनी देरी क्यों हुई?

अपील 16 साल तक लंबित कैसे रही?

जांच और ट्रायल में खामियां क्यों रहीं?

गलत सजा के लिए जिम्मेदारी किसकी है?

 एक केस, कई सबक: 

विष्णु तिवारी की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की कहानी है जहां देरी और त्रुटियों के कारण एक निर्दोष व्यक्ति को अपने जीवन के 20 साल गंवाने पड़े। यह मामला न्याय प्रणाली में सुधार, तेज सुनवाई और निष्पक्ष जांच की जरूरत को रेखांकित करता है, ताकि भविष्य में किसी और को ऐसी पीड़ा का सामना न करना पड़े।

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