13 साल में शादी, फिर 43 जहाजों की मालिक बनीं सुमती मोरारजी, जानें पूरी कहानी
सुमती मोरारजी ने 13 साल की उम्र में शादी के बाद 43 जहाजों और 6000 कर्मचारियों की कमान संभाली। जानें ‘मदर ऑफ इंडियन शिपिंग’ की प्रेरक कहानी।
13 साल में शादी, फिर 43 जहाजों की मालिक बनीं सुमती मोरारजी, जानें पूरी कहानी
नई दिल्ली। भारत के जहाजरानी इतिहास में एक ऐसा नाम दर्ज है, जिसने पुरुषों के वर्चस्व वाले उद्योग में अपनी अलग पहचान बनाई—सुमती मोरारजी। कम उम्र में शादी के बाद उन्होंने न सिर्फ पारिवारिक कारोबार संभाला, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्हें आज भी ‘मदर ऑफ इंडियन शिपिंग’ के नाम से जाना जाता है।
13 साल में शादी, ससुर ने पहचानी प्रतिभा
सुमती मोरारजी का जन्म 13 मार्च 1909 को मुंबई के एक समृद्ध कारोबारी परिवार में हुआ था। बचपन का नाम जमुना था। महज 13 साल की उम्र में उनकी शादी शांतिकुमार मोरारजी से हुई। उनके ससुर नरोत्तम मोरारजी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनका नाम बदलकर सुमती रखा, जिसका अर्थ है ‘श्रेष्ठ बुद्धि वाली स्त्री’।कम उम्र में ही उन्होंने कारोबार की बारीकियां सीखनी शुरू कर दीं और जल्द ही परिवार की प्रमुख कंपनी सिंधिया स्टीम नेविगेशन कंपनी से जुड़ गईं।
43 जहाजों का बेड़ा, 6,000 कर्मचारियों की जिम्मेदारी
1940 के दशक में सुमती मोरारजी ने कंपनी की कमान संभाली और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।कंपनी के पास 43 बड़े मालवाहक जहाज,कुल क्षमता करीब 5.5 लाख टन,6,000 से ज्यादा कर्मचारी और अधिकारी रहे।
उन्होंने उस दौर में जहाजरानी उद्योग में नेतृत्व किया, जब इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगभग न के बराबर थी।वह इंडियन नेशनल स्टीमशिप ओनर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष भी रहीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।
आजादी की लड़ाई में भी निभाई अहम भूमिका
सुमती मोरारजी सिर्फ एक उद्योगपति नहीं थीं, बल्कि राष्ट्रवादी गतिविधियों में भी सक्रिय रहीं।,महात्मा गांधी के करीबी रहीं,भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की,1947 के विभाजन के समय जहाजों से शरणार्थियों को भारत लाने में अहम भूमिका निभाई
जहाजों को मानती थीं ‘अपनी बेटियां’
सुमती मोरारजी का अपने जहाजों से गहरा भावनात्मक जुड़ाव था। वह उन्हें अपनी बेटियों की तरह मानती थीं। जब 1980 के दशक में कंपनी आर्थिक संकट में आई, तब भी उन्होंने अपने जहाजों को बचाने की पूरी कोशिश की।
पद्म विभूषण से सम्मानित
भारतीय जहाजरानी उद्योग में उनके योगदान के लिए उन्हें 1971 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 27 जून 1998 को 89 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका नाम आज भी भारतीय शिपिंग इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।सुमती मोरारजी की कहानी सिर्फ एक महिला उद्यमी की नहीं, बल्कि उस दौर की प्रेरणा है जब सामाजिक बंधनों को तोड़कर उन्होंने समुद्र की दुनिया में अपना साम्राज्य खड़ा किया।
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