Navratri 2026: नवरात्रि में माता के भक्त 9 दिन क्यों नहीं पहनते जूते-चप्पल? यहां देखें मां दुर्गा की पूजा विधि,और सामग्री

Navratri 2026: नवरात्रि में 9 दिन नंगे पैर रहने की धार्मिक मान्यता जानें। साथ ही मां दुर्गा की षोडशोपचार पूजा विधि, 16 उपचार और पूजन सामग्री की पूरी जानकारी पढ़ें।

Oct 12, 2026 - 23:00
Oct 12, 2026 - 23:00
 0  4
Navratri 2026: नवरात्रि में माता के भक्त 9 दिन क्यों नहीं पहनते जूते-चप्पल? यहां देखें मां दुर्गा की पूजा विधि,और सामग्री
Navratri 2026: 9 दिन जूते-चप्पल क्यों नहीं पहनते? जानें पूजा विधि(फाइल फोटो)

Navratri 2026: नवरात्रि में माता के भक्त 9 दिन क्यों नहीं पहनते जूते-चप्पल? यहां देखें मां दुर्गा की पूजा विधि,और सामग्री

Navratri Rituals 2026: नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना, भक्ति और साधना का विशेष अवसर माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त माता रानी को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार विभिन्न धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। इसी दौरान कुछ लोग पूरे नौ दिन जूते-चप्पल पहनना छोड़ देते हैं और नंगे पैर रहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नवरात्रि में नंगे पैर रहने की परंपरा के पीछे क्या मान्यता है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक धारणाएं।

 1. पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दौरान भक्त तन और मन की शुद्धता पर विशेष ध्यान देते हैं। पूजा-पाठ, मंत्र जाप और साधना के साथ कुछ लोग नंगे पैर रहने का संकल्प भी लेते हैं। उनके लिए यह देवी मां के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करने का एक माध्यम होता है।

 2. त्याग और आत्मसंयम की भावना

नवरात्रि में कई भक्त व्रत रखने के साथ अपनी दिनचर्या में भी बदलाव करते हैं। कुछ लोग खानपान में संयम बरतते हैं, तो कुछ अपनी सुविधाओं को सीमित रखते हैं। इसी भावना के तहत कुछ श्रद्धालु नौ दिनों तक जूते-चप्पल नहीं पहनते। इसे त्याग, अनुशासन और आत्मसंयम की भावना से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय है और सभी भक्तों के लिए ऐसा करना अनिवार्य नहीं है।

 3. चमड़े की वस्तुओं से दूरी रखने की मान्यता

पुराने समय में जूते-चप्पल बनाने के लिए चमड़े का व्यापक इस्तेमाल होता था। धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले कुछ लोग पूजा और साधना के दौरान चमड़े से बनी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहते। ऐसे में वे नंगे पैर रहना पसंद करते हैं।

हालांकि, आज के समय में जूते-चप्पल कई अन्य सामग्रियों से भी बनाए जाते हैं। इसलिए नवरात्रि में नंगे पैर रहने की परंपरा को केवल चमड़े की वस्तुओं से दूरी तक सीमित नहीं माना जा सकता।

 4. मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और समर्पण

नवरात्रि में भक्त अपनी आस्था के अनुसार अलग-अलग संकल्प लेते हैं। कोई नौ दिनों तक व्रत रखता है, कोई प्रतिदिन मंदिर में दर्शन करने जाता है, तो कोई विशेष पूजा-अनुष्ठान करता है।

इसी तरह कुछ लोग मां दुर्गा के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करने के लिए पूरे नौ दिन नंगे पैर रहने का संकल्प लेते हैं। उनके लिए यह व्यक्तिगत श्रद्धा और धार्मिक अनुशासन का हिस्सा होता है।

 5. धरती और प्रकृति से जुड़ाव की भावना

कुछ लोग नंगे पैर चलने को धरती के सीधे संपर्क और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना से भी जोड़ते हैं। नवरात्रि में घटस्थापना, मिट्टी और जौ का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। ऐसे में कुछ श्रद्धालु धरती के प्रति सम्मान व्यक्त करने के भाव से नंगे पैर रहते हैं।

यह एक सांस्कृतिक और व्यक्तिगत मान्यता है। सभी क्षेत्रों और धार्मिक परंपराओं में इसे अनिवार्य नियम के रूप में नहीं देखा जाता।

क्या नवरात्रि में नौ दिन नंगे पैर रहना जरूरी है?

नहीं, नवरात्रि के नौ दिनों तक नंगे पैर रहना सभी भक्तों के लिए जरूरी नहीं है। धार्मिक परंपराएं परिवार, क्षेत्र और व्यक्तिगत आस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।

मां दुर्गा की पूजा करने के लिए नंगे पैर रहना अनिवार्य शर्त नहीं है। भक्त अपनी श्रद्धा, सुविधा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए पूजा-पाठ और व्रत कर सकते हैं।

नवरात्रि में आस्था के साथ सेहत का भी रखें ध्यान

यदि आप नवरात्रि में नंगे पैर रहने का संकल्प लेते हैं, तो अपनी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें। सड़क की गर्म सतह, कांच के टुकड़ों, नुकीली वस्तुओं और गंदगी से बचें। मंदिर या घर में पूजा करते समय भी साफ-सफाई का ध्यान रखें।

नवरात्रि का पर्व भक्तों के लिए मां दुर्गा की आराधना, आत्मसंयम और सकारात्मकता का अवसर है। धार्मिक परंपराओं का पालन अपनी आस्था और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। किसी भी परंपरा को सभी के लिए अनिवार्य मानने के बजाय उसके पीछे की भावना को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।

Shardiya Navratri 2026: मां दुर्गा की षोडशोपचार पूजा विधि, जानें 16 उपचार और पूजन सामग्री

Shardiya Navratri Puja Vidhi 2026: शारदीय नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की आराधना और भक्ति के लिए विशेष माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख-समृद्धि, शांति तथा कल्याण की कामना करते हैं। देवी की पूजा में कई पारंपरिक विधियों का पालन किया जाता है, जिनमें षोडशोपचार पूजा का विशेष महत्व है। इस पूजा में मां दुर्गा का आवाहन करने से लेकर आरती और प्रदक्षिणा तक कुल 16 उपचारों के माध्यम से देवी का पूजन किया जाता है। आइए जानते हैं मां दुर्गा की षोडशोपचार पूजा की विधि और इसमें उपयोग होने वाली पूजन सामग्री के बारे में।

क्या होती है मां दुर्गा की षोडशोपचार पूजा?

षोडशोपचार दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें ‘षोडश’ का अर्थ सोलह और ‘उपचार’ का अर्थ सेवा या सत्कार होता है। इस पूजा पद्धति में देवी को अतिथि के समान आदर देते हुए 16 चरणों में पूजा की जाती है।

इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, आरती और प्रदक्षिणा जैसे उपचार शामिल किए जाते हैं। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में इन उपचारों के क्रम या कुछ सामग्रियों में अंतर हो सकता है।

 मां दुर्गा की षोडशोपचार पूजा के लिए सामग्री

पूजा शुरू करने से पहले आवश्यक सामग्री एकत्र कर लेना अच्छा रहता है। सामान्य रूप से इन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ सकती है:

- मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर

- पूजा के लिए चौकी और लाल कपड़ा

- कलश और शुद्ध जल

- रोली, कुमकुम, चंदन और सिंदूर

- अक्षत यानी साबुत चावल

- लाल चुनरी या वस्त्र

- फूल और फूलों की माला

- धूप, अगरबत्ती और दीपक

- घी या तेल तथा रुई की बत्ती

- फल, मिठाई और अन्य सात्विक भोग

- पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर

- यज्ञोपवीत यानी जनेऊ

- पान और सुपारी

- आरती की थाली और घंटी

सामग्री की सूची परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। सभी सामग्री उपलब्ध न होने पर श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा कर सकते हैं।

 मां दुर्गा की षोडशोपचार पूजा विधि: जानें 16 चरण

1. आवाहन

सबसे पहले पूजा स्थल को साफ करें और मां दुर्गा का ध्यान करते हुए उन्हें पूजा में विराजमान होने के लिए आमंत्रित करें। इस दौरान मन को शांत रखकर देवी से परिवार के कल्याण और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

2. आसन अर्पित करना

मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर को साफ चौकी पर स्थापित करें। देवी को प्रतीकात्मक रूप से आसन अर्पित करें और पूजा स्थल को व्यवस्थित रखें।

3. पाद्य अर्पित करना

पाद्य का अर्थ चरणों को धोने के लिए जल अर्पित करना है। इस चरण में देवी को श्रद्धापूर्वक थोड़ा शुद्ध जल अर्पित किया जाता है।

 4. अर्घ्य देना

मां दुर्गा को अर्घ्य अर्पित करें। इसके लिए अपनी पूजा परंपरा के अनुसार जल और निर्धारित सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। यह देवी के सम्मान और सत्कार का प्रतीक माना जाता है।

 5. आचमन

इस चरण में देवी को आचमन के लिए प्रतीकात्मक रूप से जल अर्पित किया जाता है। यदि घर में तस्वीर या ऐसी प्रतिमा हो जिस पर जल डालना उचित न हो, तो केवल पात्र में जल रखकर उपचार पूरा किया जा सकता है।

 6. स्नान कराना

परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की प्रतिमा को शुद्ध जल या पंचामृत से स्नान कराया जाता है। यदि प्रतिमा को स्नान कराना संभव न हो, तो प्रतीकात्मक रूप से जल अर्पित करके पूजा की जा सकती है।

 7. वस्त्र अर्पित करना

मां दुर्गा को लाल चुनरी या वस्त्र अर्पित करें। यदि प्रतिमा पर वस्त्र चढ़ाना संभव न हो, तो चुनरी को पूजा स्थल पर श्रद्धापूर्वक रख सकते हैं।

 8. यज्ञोपवीत अर्पित करना

इस चरण में देवी को यज्ञोपवीत यानी जनेऊ अर्पित किया जाता है। यह पारंपरिक षोडशोपचार पूजा का एक महत्वपूर्ण उपचार माना जाता है।

 9. गंध और सिंदूर अर्पित करना

मां दुर्गा को चंदन, रोली, कुमकुम और परंपरा के अनुसार सिंदूर अर्पित करें। प्रतिमा की सामग्री और प्रकृति का ध्यान रखते हुए ही तिलक या अन्य सामग्री का इस्तेमाल करें।

10. पुष्प अर्पित करना

देवी को ताजे फूल और फूलों की माला चढ़ाएं। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार मां दुर्गा को प्रिय माने जाने वाले पुष्प अर्पित कर सकते हैं।

 11. धूप अर्पित करना

मां दुर्गा के सामने धूप या अगरबत्ती जलाकर अर्पित करें। धूप जलाते समय कमरे में हवा आने-जाने की उचित व्यवस्था रखें और उसे ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें।

 12. दीप प्रज्वलित करना

घी या तेल का दीपक जलाकर मां दुर्गा के समक्ष रखें। दीपक को समतल और सुरक्षित स्थान पर रखें तथा उसे जलता हुआ अकेला न छोड़ें।

 13. नैवेद्य अर्पित करना

मां दुर्गा को फल, मिठाई, खीर या अन्य सात्विक भोग अर्पित करें। भोग की सामग्री अपनी धार्मिक और पारिवारिक परंपरा के अनुसार चुन सकते हैं।

14. तांबूल अर्पित करना

पूजा की परंपरा के अनुसार मां दुर्गा को पान और सुपारी अर्पित की जाती है। सामग्री उपलब्ध न होने पर अपनी परंपरा के अनुसार प्रतीकात्मक अर्पण भी किया जा सकता है।

 15. आरती करना

सभी उपचार पूरे होने के बाद मां दुर्गा की आरती करें। इस दौरान देवी के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन भी किया जा सकता है। परिवार के सदस्य मिलकर आरती में शामिल हो सकते हैं।

 16. प्रदक्षिणा करना

पूजा के अंत में मां दुर्गा की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करें। यदि पूजा स्थल पर पर्याप्त जगह न हो, तो अपनी जगह पर खड़े होकर प्रतीकात्मक प्रदक्षिणा कर सकते हैं। अंत में देवी से अपनी पूजा स्वीकार करने और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।

षोडशोपचार पूजा करते समय इन बातों का रखें ध्यान

- पूजा स्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।

- पूजन सामग्री पहले से तैयार कर लें, ताकि पूजा के दौरान बार-बार उठना न पड़े।

- देवी को अर्पित की जाने वाली सामग्री अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार चुनें।

- प्रतिमा या तस्वीर पर जल, चंदन अथवा अन्य सामग्री का इस्तेमाल सावधानी से करें।

- दीपक और धूप को सुरक्षित स्थान पर रखें और जलता हुआ अकेला न छोड़ें।

- किसी विशेष मंत्र या विधि को लेकर संदेह हो, तो अपनी परंपरा के जानकार से मार्गदर्शन ले सकते हैं।

 श्रद्धा और समर्पण से करें मां दुर्गा की आराधना

धार्मिक मान्यता के अनुसार, षोडशोपचार पूजा मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, सम्मान और समर्पण व्यक्त करने का पारंपरिक तरीका है। शारदीय नवरात्र में भक्त अपनी आस्था और सामर्थ्य के अनुसार देवी की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। पूजा में सामग्री की संख्या से अधिक श्रद्धा, स्वच्छता और एकाग्रता को महत्व दिया जाता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित परंपराओं पर आधारित सामान्य जानकारी प्रदान करता है। अलग-अलग क्षेत्रों, परिवारों और समुदायों में रीति-रिवाज भिन्न हो सकते हैं।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow